Khan Abdul Ghaffar Khan Essay In Hindi

जन्म: 6 फरवरी 1890, चरसद्दा, खईबर, पख्तुन्ख्वा, पाकिस्तान

निधन: 20 जनवरी 1988, पेशावर, पाकिस्तान

कार्य: पश्तूनी स्वाधीनता सेनानी, स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान, जिन्हें “सीमान्त गांधी”, “बच्चा खाँ” तथा “बादशाह खान” के नाम से भी पुकारा जाता है, ब्रिटिश सरकार से आजादी के लिए संघर्षरत ‘स्वतंत्र पख्तूनिस्तान’ आंदोलन के प्रणेता थे। अब्दुल गफ्फार खान एक राजनैतिक और आध्यात्मिक नेता थे जिन्हें महात्मा गाँधी की तरह उनके अहिंसात्मक आन्दोलन के लिए जाना जाता है। वो महात्मा गाँधी के परम मित्र थे और ब्रिटिश इंडिया में उन्हें ‘फ्रंटियर गाँधी’ के नाम से भी संबोधित किया जाता था। उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ नामक सामाजिक संगठन प्रारंभ किया जिसकी सफलता ने अंग्रेजी हुकुमत को बेचैन कर दिया। उन्होंने सरहद पर रहने वाले उन पठानों को अहिंसा का रास्ता दिखाया, जिन्हें इतिहास में हमेशा ‘लड़ाके’ के तौर पर दर्शाया गया था।  नमक सत्याग्रह के दौरान 23 अप्रैल 1930 को गफ्फार खां के गिरफ्तारी के बाद खुदाई खिदमतगारों ने पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में एक जुलूस निकाला। अंग्रेजी प्रशासन ने उन पर गोलियां बरसाने का हुक्म दे दिया और देखते ही देहते 200 से 250 लोग मारे गए पर प्रतिहिंसा नहीं हुई। ये कमाल गफ्फार खां के करिश्माई नेतृत्व का था।

इस महान नेता ने सदैव ‘मुस्लिम लीग’ द्वारा देश के विभाजन के मांग का विरोध किया और जब अंततः कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार कर लिया तब वो बहुत निराश हुए और कहा, ‘आप लोगों ने हमें भेड़ियों के सामने फ़ेंक दिया।” विभाजन के बाद उन्होंने पाकिस्तान के साथ रहने का निर्णय लिया और पाकिस्तान के अन्दर ही ‘पख्तूनिस्तान’ नामक एक स्वायत्त प्रशासनिक इकाई की मांग करते रहे। पाकिस्तान सरकार ने उन पर हमेशा ही शक किया जिसके कारण पाकिस्तान में उनका जीवन अक्सर जेल में ही गुजरा।

प्रारंभिक जीवन

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान का जन्म ब्रिटिश इंडिया में पेशावर घाटी के उत्मान जई में एक समृद्ध परिवार मैं हुआ था। उनके पिता बहराम इलाके के एक समृद्ध ज़मींदार थे और स्थानीय पठानों के विरोध के बावजूद उन्होंने अपने दोनों बेटों को अंग्रेजों द्वारा संचालित ‘मिशन स्कूल’ में पढ़ाया। गफ्फार पढ़ाई में होशियार थे और मिशन स्कूल में उन्होंने शिक्षा के महत्त्व को समझा। हाई स्कूल के अंतिम वर्ष में उन्हें अंग्रेजी सरकार के अंतर्गत पश्तून सैनिकों के एक विशेष दस्ते में शामिल होने का प्रस्ताव मिला पर सोच-विचार के बाद उन्होंने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योंकि उन्हें अच्छी तरह से पता था कि इस ‘विशेष दस्ते’ के अधिकारियों को भी उन्ही के देश में द्वीतीय श्रेणी का नागरिक समझा  जाता था।

इसके बाद गफ्फार खान ने अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और आगे की पढाई के लिए अपने भाई की तरह लन्दन जाना चाहते थे पर उनकी मां इसके खिलाफ थीं इसलिए उन्होंने यह विचार त्याग दिया और अपने पिता के साथ खेती-बाड़ी का कार्य करने लगे।

सामाजिक उत्थान और स्वाधीनता आन्दोलन

सन 1910 में बीस साल की उम्र में गफ्फार ने अपने गृहनगर उत्मान जई में एक स्कूल खोला जो बहुत सफल साबित हुआ। 1911 में वो पश्तून स्वतंत्रता सेनानी तुरंग जई के हाजी साहेब के स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल हो गए। अंग्रेजी हुकुमत ने उनके स्कूल को सन 1915 में प्रतिबंधित कर दिया। सन 1915 से लेकर 1918 तक उन्होंने पश्तूनों को जागृत करने के लिए लगभग 500 गांवों की यात्रा की जिसके बाद उन्हें ‘बादशाह खान’ का नाम दिया गया।

बाचा खान ने अंग्रेजों के विरुद्ध लगभग सारे विद्रोहों को असफल होते देखा था अतः उन्हें लगा कि सामाजिक चेतना के द्वारा ही पश्तूनों में परिवर्तन लाया जा सकता है। इसके बाद बादशाह खान ने एक के बाद एक कई सामाजिक संगठनों की स्थापना की। नवम्बर 1929 में उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ की स्थापना की जिसकी सफलता ने अंग्रेजी हुकुमत की नींद उड़ा दी और फिर उसे बर्बरता पूर्वक कुचलने की कोशिश हुई।

खुदाई खिदमतगार

पश्तूनों के उत्थान में संघर्षरत बादशाह खान एक ऐसे भारत की स्थापना चाहते थे जो आज़ाद और धर्मनिरपेक्ष हो। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ नामक संगठन बनाया जिसे ‘सुर्ख पोश’ भी कहा गया। खुदाई खिदमतगार की स्थापना महात्मा गाँधी के अहिंसा और सत्याग्रह जैसे सिद्धान्तों से प्रेरित होकर की गयी थी।

बादशाह खान के करिश्माई नेतृत्व का कमाल था कि संगठन में लगभग 100000 सदस्य शामिल हो गए और उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अंग्रेजी पुलिस और सेना का विरोध करना शुरू कर दिया। खुदाई खिदमतगारों ने हड़तालों, राजनैतिक संगठन और अहिंसात्मक प्रतिरोध के माध्यम से अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ सफलता हासिल की और ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ में एक प्रमुख राजनैतिक शक्ति बन गये। बादशाह के भाई डॉ खान अब्दुल जब्बर खान ने संगठन के राजनैतिक खंड की जिम्मेदारी संभाली और 1920 के दशक के अंतिम सालों से लेकर सन 1947 तक प्रान्त के मुख्यमंत्री रहे।

किस्सा ख्वानी नरसंहार

1930 ई. के नमक सत्याग्रह के दौरान गफ्फार खान को 23 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया जिसके स्वरुप खुदाई खिदमतगारों का एक जत्था विरोध प्रदर्शन के लिए पेशावर के किस्सा ख्वानी बाज़ार में इकठ्ठा हुआ। अंग्रेजों ने निहत्थी और अहिंसात्मक भीड़ पर मशीनगनों से गोलियां चलाने का आदेश दिया जिसमे लगभग 200 -250 लोग मारे गए। इसी दौरान गढ़वाल राइफल रेजिमेंट के दो प्लाटूनों ने निहत्थी और अहिंसात्मक भीड़ पर गोलियां चलाने से इनकार कर दिया जिसके परिणामस्वरूप उनका कोर्ट मार्शल किया गया और कठोर सजा सुनाई गयी।

गफ्फार खान और कांग्रेस

गफ्फार खान और महात्मा गाँधी के बीच एक आध्यात्मिक स्तर की मित्रता थी। दोनों को एक दूसरे के प्रति अपार स्नेह और सम्मान था और दोनों ने सन 1947 तक मिल-जुलकर काम किया। गफ्फार खान के खुदाई खिदमतगार और कांग्रेस (जो स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व कर रही थी) ने स्वाधीनता के संघर्ष में एक-दूसरे का साथ निभाया। बादशाह खान खुद कांग्रेस के सदस्य बन गए थे। कई मौकों पर जब कांग्रेस गांधीजी के विचारों से सहमत नहीं होती तब गफ्फार खान गाँधी के साथ खड़े दिखते। वो कई सालों तक कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य रहे पर उन्होंने अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया।

गफ्फार खान महिला अधिकारों और अहिंसा के पुरजोर समर्थक थे। उन्हें एक ऐसे समाज से भी घोर सम्मान और प्रतिष्ठा मिली जो अपने ‘लड़ाकू’ प्रवित्ति के लिए जाना जाता था। उन्होंने ताउम्र अहिंसा में अपना विश्वास कायम रखा। उनके इन सिद्धांतों के कारण भारत में उन्हें ‘फ्रंटियर गाँधी’ के नाम से पुकारा जाता है।

भारत का विभाजन

एक धर्मनिरपेक्ष इंसान होने के नाते गफ्फार खान ने हमेशा ही भारत के विभाजन का विरोध किया जिसके कारण लोगों ने उन्हें मुस्लिम-विरोधी भी कहा और 1946 में पेशावर में उनपर जानलेवा हमला भी हुआ। जब कांग्रेस भारत का विभाजन रोकने में असफल रही तब गफ्फार खान बहुत आहत हुए। उन्होंने गाँधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं से कहा, ‘आप लोगों ने हमे भेड़ियों के सामने फेंक दिया’।

सन 1947 में जब ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ को पाकिस्तान में शामिल होने के मसले पर जनमत संग्रह कराया गया तब कांग्रेस और गफ्फार खान ने इसके विरोध किया और जनमत संग्रह में शामिल होने से इनकार कर दिया जिसके परिणामस्वरुप ‘खईबर-पख्तुन्ख्वा’ ने बहुमत से पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में मत दिया।

पकिस्तान और गफ्फार खान

हालांकि देश के विभाजन से गफ्फार खान किसी प्रकार से भी सहमत नहीं थे पर बंटवारे के बाद उन्होंने पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लिया और देश के प्रति अपनी निष्ठा भी प्रकट की लेकिन पाकिस्तानी हुकुमत को उनकी निष्ठा पर सदैव संदेह रहा। विडम्बना ऐसे रही की इस महान देशभक्त और स्वतंत्राता सेनानी की इच्छाओं को पाकिस्तान की सरकार ने अनसुना कर दिया और सरकार खान एवं उनके समर्थकों को पाकिस्तान की विकास और प्रगति में बाधा मानते रहे।

उनकी निष्ठा पर संदेह करनेवाली तमाम सरकारों ने उन्हें या तो घर में नजरबन्द रखा या जेल में रखा। इलाज के लिए वो कुछ समय के लिए इंग्लैंड गए और फिर वहां से अफगानिस्तान चले गए।  लगभग 8 सालों तक निर्वासित जीवन बिताने के बाद 1972 में वो वापस लौटे पर बेनजीर भुट्टो सरकार ने उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया।

सन 1987 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।

निधन

खान अब्दुल गफ्फार खान का निधन सन 1988 में पेशावर में हुआ जहाँ उन्हें घर में नजरबन्द रखा गया था। उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें उनके जलालाबाद (अफगानिस्तान) स्थित घर में दफनाया गया। उनके अंतिम संस्कार में 2 लाख से भी ज्यादा लोग शामिल हुए जो उनके महान व्यक्तित्व का परिचायक था।



 



Abdul Gaffar Khan Biography


Abdul Gaffar Khan Biography

Khan Abdul Gaffar Khan is one of the tallest freedom fighter, not only in sheer physical height but also in his contributions and sacrifices. He dedicated his life for the betterment of his fellow country men and hugely inspired the Pathans of the north-west frontier to follow the Gandhian values of non-violence and non-possession. No wonder he was described as the 'Frontier Gandhi'.

Abdul Gaffar Khan was born in 1890 to Khan Behram Khan of Utmanzai village, Peshwar. Despite being illiterate both of his parents were broad minded and wanted their children to get proper education. Abdul was sent to a Missionary school in Peshwar after his primary education. Abdul was selected in the British Indian Army but soon left the army after observing the ill-treatments and insults the Indians faced there.

The Pathans at that time were mostly uneducated and unorganized. Moreover the British wanted them to keep them backward in order to control them easily. Abdul realized the need of the hour and opened schools for children and women. For this Abdul was jailed and brutally treated. Despite the British injustices and the threats, the schools started flourishing. After his release he published a national newspaper- 'Pakhtun' which became very popular. At this juncture, the progressive king- Amanullah came forward in his support. The British and the local Mullahs conspired to destroy these developments. In 1928, Abdul came to India and met Gandhiji and Nehruji. Impressed and inspired by the nationalistic fervour, Abdul established an organization to bring social reforms.

It was called Khudai Khidmatgars and every member of the organization vowed to practice non-violence, brotherhood and serve humanity in the name of God. The British tried every possible way to destroy the movement. They attacked, they destroyed, they killed, they tortured but couldn't make the Pathans to break their vows. Khan was put to the prison again and inhumanly tortured. He did not get any support from the Muslim League but the Congress promised help, if the Pathans join the Indian Freedom Struggle. The Congress sent reports allover India, Engalnd and even in America about the sorry state of the Pathans.

At last, after a long period of imprisonment, Khan was released in 1945. He passed away in 1998 and thousands of people walked in his funeral procession to pay homage to their hero.

Facts and Information about Abdul Gaffar Khan



Other NamesFakhr-e Afghan, Bacha Khan, Pacha Khan or Badshah Khan
Born1890 in Utmanzai, Hashtnagar, Punjab Province, British India (now in Pakistan)
Died20 January, 1988 in Peshawar, Pakistan
Resting PlaceJalalabad, Nangarhar, Afghanistan
FatherBahram Khan
WifeMeharqanda Kinankhel, Nambata Kinankhel
SonsAbdul Wali Khan, Abdul Ghani Khan, Sardaro, Mehar Taja, Abdul Ali Khan
BrotherDr. Khan Sahib
ReligionIslam
Political movementKhudai Khidmatgar
OrganizationPakistan Socialist Party, Indian National Congress, National Awami Party
AboutHe was a spiritual as well as political leader. He opposed the British Raj in India. He is known as "Frontier Gandhi" because of his close relations with Gandhi.
Join freedom movementHe became a part of Haji Sahib's freedom movement in 1911.
MarriageHe married Meharqanda in 1912 and in 1913 their son Abdul Ghani Khan was born.
RemarriageAfter Meharqanda he married Nambata, his first wife's cousin. Mehar Taj, their daughter, was born on 25 May 1921 and on 20 August 1922 their son Abdul Ali Khan was born.
Khudai KhidmatgarHe founded the political organisation Khudai Khidmatgar ("Servants of God") to oppose the British rule. The movement was also known as Surkh Posh ("Red Shirts").
 In 1931 he declind the offer to accept the presidency of the party saying, "I am a simple soldier and Khudai Khidmatgar, and I only want to serve." In 1939 he left the Congress party. After the revision of the War Policy he rejoined the INC.


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Last Updated on : August 8, 2014

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